बिहार की बाढ़ — मिष्टी और अनिकेत

 


बिहार की बाढ़ — मिष्टी और अनिकेत

बिहार में उस साल बारिश कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।

आसमान कई दिनों से रो रहा था और नदी… जैसे अपना किनारा भूल चुकी थी। पानी धीरे-धीरे गाँव की गलियों, घरों और लोगों की ज़िंदगी में उतर रहा था।

हर तरफ अफरा-तफरी थी।

कोई अपना घर छोड़ रहा था, कोई अपने बच्चों को सीने से लगाए भाग रहा था, और कोई अपनी आँखों के सामने अपनी पूरी ज़िंदगी पानी में बहते हुए देख रहा था।

उसी गाँव में मिष्टी रहती थी।

और उसी गाँव में अनिकेत

दोनों एक-दूसरे को बचपन से जानते थे।

उनके बीच दोस्ती थी, अपनापन था… और शायद उससे भी कुछ ज़्यादा।

लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें नाम देने की हिम्मत नहीं होती।

अनिकेत रोज़ किसी न किसी बहाने मिष्टी के घर के पास से गुजरता था।

मिष्टी भी खिड़की से उसे जाते हुए देखती थी।

दोनों जानते थे कि उनके दिल में कुछ है।

बस… दोनों ने कभी कहा नहीं।

शायद उन्हें डर था कि कहीं कह देने से जो रिश्ता अभी खूबसूरत है, वही टूट न जाए।


उस शाम बारिश अचानक और तेज़ हो गई।

नदी का पानी गाँव में घुस चुका था।

लोग ऊँची जगहों की तरफ भाग रहे थे।

मिष्टी अपने घर में अपनी छोटी बहन को ढूँढ़ रही थी।

तभी उसे पता चला कि उसकी बहन बाहर बने पुराने कमरे में फँसी हुई है।

मिष्टी बिना कुछ सोचे पानी में उतर गई।

तभी पीछे से अनिकेत की आवाज़ आई—

“मिष्टी!”

वह पलटी।

अनिकेत पानी को चीरता हुआ उसकी तरफ आ रहा था।

“तुम यहाँ क्यों आए?”

अनिकेत ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें लेने।”

“लेकिन पानी बहुत गहरा है…”

अनिकेत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तो डूबेंगे… लेकिन साथ।”

मिष्टी कुछ नहीं कह सकी।

उस एक पल में उसे पहली बार समझ आया कि कुछ लोग प्यार का इज़हार शब्दों से नहीं, अपनी जान जोखिम में डालकर करते हैं।

दोनों कमरे तक पहुँचे।

मिष्टी की बहन अंदर एक कोने में रो रही थी।

अनिकेत ने उसे उठाया और मिष्टी को अपने पीछे चलने को कहा।

लेकिन वापस लौटते समय पानी का बहाव अचानक तेज़ हो गया।

मिष्टी का पैर फिसला।

वह पानी में गिरने लगी।

“अनिकेत!”

अनिकेत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

लेकिन बहाव इतना तेज़ था कि उसका हाथ भी छूटने लगा।

मिष्टी रोते हुए बोली—

“मेरा हाथ छोड़ दो… तुम खुद बच जाओगे।”

अनिकेत की आँखों में आँसू आ गए।

उसने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

“तुम्हें छोड़कर बच भी गया… तो उस ज़िंदगी का क्या करूँगा?”

मिष्टी रो पड़ी।

उसने पहली बार महसूस किया कि वह अनिकेत को सिर्फ पसंद नहीं करती थी।

वह उससे प्यार करती थी।


उस रात पूरा गाँव एक पुराने स्कूल की इमारत में शरण लिए हुए था।

बाहर सिर्फ पानी था।

अंदर सैकड़ों डरे हुए लोग।

किसी की माँ गायब थी, किसी का घर बह चुका था, किसी का बच्चा नहीं मिल रहा था।

मिष्टी खिड़की के पास बैठी थी।

उसके कपड़े अभी भी गीले थे।

अनिकेत उसके पास आया और बिना कुछ कहे अपना गमछा उसके कंधों पर रख दिया।

मिष्टी ने उसकी तरफ देखा।

कुछ देर दोनों खामोश रहे।

फिर मिष्टी ने धीमे से पूछा—

“अनिकेत… अगर आज हम नहीं बचे तो?”

अनिकेत चुप रहा।

मिष्टी की आँखों से आँसू गिरने लगे।

“मुझे तुमसे एक बात कहनी है।”

“कहो।”

“मैंने बहुत बार तुम्हें रोकना चाहा… बहुत बार कहना चाहा कि मत जाया करो। लेकिन कभी कह नहीं पाई।”

अनिकेत उसकी तरफ देखने लगा।

मिष्टी ने काँपती आवाज़ में कहा—

“मुझे तुमसे प्यार है।”

अनिकेत की आँखें भर आईं।

वह धीरे से मुस्कुराया।

“मुझे लगा था… ये बात मुझे अपनी आखिरी साँस में कहनी पड़ेगी।”

मिष्टी ने पूछा—

“तुम्हें कब से पता था?”

अनिकेत ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

“जब से तुम्हारी खुशी मेरी खुशी से ज़्यादा जरूरी लगने लगी थी।”

मिष्टी ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

बाहर नदी सब कुछ बहा रही थी।

और अंदर दो लोग पहली बार अपने दिल की सारी बातें कह रहे थे।


सुबह हुई।

बारिश रुक चुकी थी।

लेकिन अनिकेत कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

मिष्टी घबरा गई।

वह हर तरफ उसे ढूँढ़ने लगी।

“अनिकेत!”

कोई जवाब नहीं आया।

उसने पूरे स्कूल में उसे खोजा।

फिर गाँव की तरफ भागी।

हर जगह पानी था।

कीचड़ था।

टूटे हुए घर थे।

लेकिन अनिकेत नहीं था।

मिष्टी की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।

उसे नदी के किनारे अनिकेत का वही गमछा मिला, जो उसने रात को उसके कंधों पर रखा था।

वह वहीं बैठ गई।

गमछे को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।

“तुमने कहा था साथ डूबेंगे… फिर मुझे अकेला क्यों छोड़ गए?”

उस दिन मिष्टी को पहली बार समझ आया—

बाढ़ सिर्फ घर नहीं बहाती… कभी-कभी वह इंसान की पूरी दुनिया अपने साथ ले जाती है।


कई महीने बीत गए।

गाँव फिर से बसने लगा।

लोगों ने अपने घर बनाए।

लेकिन मिष्टी के अंदर एक घर हमेशा के लिए खाली रह गया।

वह हर साल बारिश आने पर नदी के किनारे चली जाती।

वहीं बैठकर अनिकेत से बातें करती।

“आज बारिश बहुत अच्छी है…”

“आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है…”

“आज गाँव में फिर वही मेले लगे हैं…”

लोग कहते थे कि मिष्टी पागल हो गई है।

लेकिन मिष्टी जानती थी—

जिसे सच्चे दिल से प्यार किया हो, उससे बात करने के लिए उसका सामने होना जरूरी नहीं होता।

एक साल बाद फिर बारिश आई।

मिष्टी नदी के किनारे बैठी थी।

अचानक पीछे से किसी ने आवाज़ दी—

“मिष्टी…”

उसका दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।

वह धीरे-धीरे पलटी।

सामने अनिकेत खड़ा था।

ज़िंदा।

थका हुआ।

आँखों में वही प्यार लिए हुए।

मिष्टी कुछ बोल नहीं पाई।

बस दौड़कर उसके सीने से लग गई।

अनिकेत ने उसे कसकर पकड़ लिया।

दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

फिर मिष्टी ने रोते हुए कहा—

“तुम इतने दिनों तक कहाँ थे?”

अनिकेत ने धीरे से कहा—

“पानी मुझे बहुत दूर ले गया था… लेकिन तुम्हारे पास वापस आने की वजह हर दिन मेरे साथ थी।”

मिष्टी ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

उस दिन बारिश फिर हो रही थी।

लेकिन इस बार बारिश में डर नहीं था।

क्योंकि जिस इंसान को खो देने का डर सबसे बड़ा था…

वही इंसान उसके सामने खड़ा था।

और शायद यही प्यार है—

जब पूरी दुनिया तुम्हें एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश करे, फिर भी दिल उसी इंसान तक लौटने का रास्ता ढूँढ़ ले।

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